गुरुवार, 18 मार्च 2010

माता पिता की उंगली मैंने नहीं पकड़ी .... - सतीश सक्सेना

अविनाश वाचस्पति का यहाँ लिखा पहला लेख "माता पिता की उंगली श्रष्टिनियंता की होती है " का शीर्षक पढ़ कर ही आँखों में आंसू छलछला उठे, मैंने अपने बचपन में क्या गुनाह किया था कि परमपिता ने यह कठोर कदम उठाया ! शायद धर्म विवेचन में सिद्ध विद्वान् इसका उत्तर दे सकने में समर्थ हों पर जिस बच्चे से 3 वर्ष में माँ और ६ वर्ष में पिता छिन गए हों वह आज भी यह समझने  में असमर्थ है ! शायद यह क्रूर घटना किसी को भी ईश्वरीय सत्ता पर से अविश्वास कराने के लिए काफी है...


         आज के समय में ,जब मैं घर के  ७० वर्षीय भूतपूर्व मुखिया को मोहल्ले की दुकान पर ही खड़े होकर, खरीदे गए सामान में से ,जल्दी जल्दी कुछ खाते हुए देखता हूँ  तो मुझे अपने पिता याद आते हैं कि काश वे होते और मुझे उनकी सेवा का मौका मिला होता  यकीनन वे एक सुखी पिता होते ! मगर मुझ अभागे की किस्मत में यह नहीं लिखा था ..


          और क्या अपना खून देकर आपको  सींचने  वाली माँ  की स्थिति कहीं ऐसी तो नहीं  ? अगर हाँ तो निश्चित मानिए आपके साथ इससे भी बुरा होगा  !  



26 टिप्‍पणियां:

P.N. Subramanian ने कहा…

अपने पूज्य पिताजी की याद आ रही है. इस राम नवमी पर उनकी १०० वीं वर्षगाँठ मनाते.

Yashwant Mehta "Yash" ने कहा…

आपका लेख बहुत मार्मिक हैं पढ़कर आँखों में आंसू आ गए

अजित गुप्ता का कोना ने कहा…

सतीश जी, बहुत ही मार्मिक पोस्‍ट है। आज युग बदल गया है। किसी ने भी अपने माता-पिता की चाहे कितनी भी सेवा की हो लेकिन आज हर व्‍यक्ति अकेला है। हम सभी अकेले है। शायद एक दिन हम सब ही एक परिवार बना लें और फिर सुखी हो जाएं?

रज़िया "राज़" ने कहा…

रुलाकर ही छोडा आपकी पोस्ट ने। सतीशजी।

Udan Tashtari ने कहा…

निःशब्द!

M VERMA ने कहा…

अत्यंत मार्मिक
आपकी पोस्ट पढ़्कर हर उस व्यक्ति को अपने मात-पिता की याद आयेगी ही जो उनके साहचर्य से वंचित है.

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

aapka dhanyavaad, judne ke liye.

dhiru singh { धीरेन्द्र वीर सिंह } ने कहा…

............ लेकिन उनका आशीर्वाद हमेशा आपके साथ रहा जो आपको तरक्की देता रहा .

Satish Saxena ने कहा…

@डॉ कुमारेन्द्र,
धन्यवाद आपका डॉ कुमारेन्द्र, जो आपने इज्ज़त आफजाई की ! यह विषय बेहद महत्वपूर्ण है , इसपर जितना लिखा जाये वह कम होगा !!

Satish Saxena ने कहा…

@धीरू सिंह जी !
सच कहा आपने , आज भी हर कष्ट में लगता है वे मेरे आस पास ही हैं ! आपके शब्दों से ही माता पिता के प्रति आपका लगाव पता चलता है, आत्मीयता के लिए आभार !!

Satish Saxena ने कहा…

@ यशवंत मेहता एवं रजिया राज जी ,
आप लोगों की आंख में आंसू आने से इस लेख का मकसद पूरा हो गया !
आभार !

''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल ने कहा…

नमस्कार
ब्लोगिंग की दुनिया में भरापूरा स्वागत करते हैं.आपके ब्लॉग पर आकर कुछ
सार्थकता लगी है.यूहीं लगातार बने रहें और बाकी के ब्लोगों पर सफ़र करके अपनी
राय जरुर लिखें.यही जीवन है.जो आपको ज्यादा साथियों तक जोड़ पायेगा.

सादर,

माणिक
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Jayram Viplav ने कहा…

कली बेंच देगें चमन बेंच देगें,

धरा बेंच देगें गगन बेंच देगें,

कलम के पुजारी अगर सो गये तो

ये धन के पुजारी वतन बेंच देगें।

हिंदी चिट्ठाकारी की सरस और रहस्यमई दुनिया में राज-समाज और जन की आवाज "जनोक्ति "आपके इस सुन्दर चिट्ठे का स्वागत करता है . . चिट्ठे की सार्थकता को बनाये रखें . नीचे लिंक दिए गये हैं . http://www.janokti.com/ , साथ हीं जनोक्ति द्वारा संचालित एग्रीगेटर " ब्लॉग समाचार " http://janokti.feedcluster.com/ से भी अपने ब्लॉग को अवश्य जोड़ें .

شہروز ने कहा…

आपकी लेखनी के सभी कायल तो हैं ही लेकिन इधर जिस क़दर आपके यहाँ संवेदनशीलता मुखर हो रही है....उसके अतिरेक से हम सभी गलदश्रु हैं.रज़िया साहिबा से सहमत!

लेकिन बचपन में माँ-पिता के साए से वंचित होने के बाद आपके अन्दर जिस वात्सल्य और ममता का संचारित विकास हुआ है,दुर्लभ है!

किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए..

ये सब आप से ही तो सीखा जाता है.

सम्वेदना के स्वर ने कहा…

आंखें भर आईं... और टिप्पणीके नाम पर बस यही कहने को जी चाहता है कि
गर फिर्दौस बर्रूये ज़मीनस्तो
हमींनस्तो, हमींनस्तो, हमींनस्तो.
अगर ज़मीन पर कहीं स्वर्ग है तो यहीं है, यहीं है, यहीं है अर्थात माता पिता के चरणों में..

manish badkas ने कहा…

फूलों के ही दीवाने हैं सब,
कांटो से दिल कौन लगाये,
कांटे ही लिए बैठें हैं अब,
फूल तो कब के मुरझाये...

चुनने की भूल की थी तब,
अब तो यह राज़ साफ़ नज़र आए,
खुशबु बनकर महके है रब,
रब ही तो कांटो में समाये...

shikha varshney ने कहा…

अत्यंत मार्मिक
आपकी पोस्ट पढ़्कर हर उस व्यक्ति को अपने मात-पिता की याद आयेगी ही जो उनके साहचर्य से वंचित है
पर यकीन मानिये वे हमेशा आपके आस पास ही होते हैं

sakhi with feelings ने कहा…

जिनके माँ बाप उनके साथ नहीं होते उनको उनका महत्व पता होता है मगर जिनके माँ बाप जिन्दा होते है आज कल बहुत से ऐसे बच्चे है जो अपने माँ बाप को बुढ़ापे मे बेसहारा छोड़ अपनी ही दुनिया मे रम जाते है ..उनको भगवन भी सुखी नहीं रखता है ..आपकी पोस्ट बहुत कुछ कह गयी

Chandan Kumar Jha ने कहा…

बहुत हीं मार्मिक । आभार


गुलमोहर का फूल

shama ने कहा…

Manki gahrayise likha hai aapne..aankhen nam ho gayeen..

shama ने कहा…

Aapka lekhan hamesha sashakt raha hai..

kshama ने कहा…

Bahut sundar aalekh jo aankhen nam kar gaya..

E-Guru Rajeev ने कहा…

अनुत्तरित हो गया हूँ......... बस हर पिता समान में अपने पिता के दर्शन करिए और उनकी सेवा करें, निश्चय ही आपको सुख और प्रसन्नता प्राप्त होगी.
:)

Akanksha Yadav ने कहा…

बहुत मार्मिक बात कही आपने. सोचनीय

__________
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दीपक 'मशाल' ने कहा…

bahut taqleefdeh hota hai ye sab...

अरुणेश मिश्र ने कहा…

प्रशंसनीय ।